इस दिन बाल ब्रह्मचारी भीष्म पितामह ने अपना शरीर छोड़ा था। भीष्म अर्जुन के बाणों से घायल हो चुके थे। भीष्म पितामह हिमालय की तरह अडिग, सागर की तरह गम्भीर तथा आकाश की तरह निर्मल एवं शांत थे। इन्हीं के मान की रक्षा के लिए महाभारत में श्रीकृष्ण ने अपना प्रण भंग किया था। इस दिन भीष्म पितामह के निमित्त तिलों के साथ तर्पण तथा श्राद्ध करने वाले व्यक्ति को सन्तान की प्राप्ति होती है।

कथा – भीष्म, शांतनु की पटरानी गंगा की कोख से उत्पन्न हुए थे। एक बार शांतनु शिकार खेलते-खेलते गंगा के पार चले गये। लौट कर आने पर हरिदास नामक केवट की पुत्री मत्स्य-गंधा ने उन्हें नौका पर बिठाकर पार किया। मत्स्य-गंधा वास्तव में केवट द्वारा परिपालिता थी। वह किसी क्षत्रिय की कन्या थी। राजा शांतनु ने उसके सौन्दर्य पर मुग्ध होकर केवट से उसके साथ विवाह प्रस्ताव किया। परन्तु राजा के प्रस्ताव को केवट ने ठुकराते हुए कहा, “महाराज! आपका ज्येष्ठ पुत्र भीष्म जीवित है। इसलिए आपका उत्तराधिकारी वही होगा, मेरी कन्या की कोख से पैदा होने वाला उत्तराधिकारी नहीं हो सकता। अतः आपको इस कन्या का दान देना उचित नहीं प्रतीत होता । ”

घर आकर राजा शांतनु व्याकुल रहने लगे। एक दिन भीष्म ने • राजा की व्याकुलता का कारण पूछा। सारा वृत्तान्त ज्ञात होने पर भीष्म स्वयं केवट के पास गए। उन्होंने गंगाजी में प्रवेश करके आजीवन अविवाहित जीवन व्यतीत करने का संकल्प किया। इसी कठिन प्रतिज्ञा के कारण उनका नाम भीष्म पड़ा; अन्यथा उनका नाम गांगेय था । फलतः केवट ने मत्स्यगंधा का विवाह शांतनु से कर दिया। राजा शांतनु ने भीष्म को प्रसन्न होकर वरदान दिया कि तुम अपनी इच्छा के बिना नहीं मरोगे। भीष्म पितामह मृत्युपर्यन्त अविवाहित रहे ।

भीष्म पितामह हंस्तिनापुर में दुर्योधन के पास रहते थे। कौरवों- पाण्डवों के युद्ध में उन्होंने दुर्योधन का ही साथ दिया था। युद्ध में निरंतर दुर्योधन ने अपनी हार होती देख भीष्म पितामह पर संदेह करते हुए यह प्रकट किया कि भीष्म पितामह पाण्डवों का पक्ष ले रहे हैं। भीष्म जी यह जानकर बड़े दुखी हुए। परिणामतः उन्होंने ऐसी प्रतिज्ञा की जिससे श्रीकृष्ण जी को भी हथियार उठाना पड़े। उस दिन के युद्ध की, भीष्मता को देखकर अर्जुन को कृष्ण से कहना पड़ा कि यदि भीष्म के वेग को न रोका गया तो पाण्डवों का सर्वनाश हो जाएगा। परिणामतः श्रीकृष्ण ने सुदर्शन चक्र हाथ में लेकर अपनी शस्त्र न धारण करने की प्रतिज्ञा भंग कर दी। ज्योंही श्रीकृष्ण ने सुदर्शन चक्र धारण किया भीष्म जी ने युद्ध बन्द कर दिया और स्वयं बाणों की शय्या पर जाकर लेट गए। महाभारत के युद्ध की समाप्ति पर जब सूर्य देवता दक्षिणायन से उत्तरायण हुए तब भीष्म शरीर त्याग त्याग दिया। इसीलिए यह दिन उनकी पावन स्मृति में उत्सव के रूप में मनाया जाता है।

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