यह व्रत संतान देने वाला है। इस व्रत को विधिपूर्वक करने से सन्तान की प्राप्ति भी होती है और सन्तान की रक्षा भी। स्त्री समाज में इस व्रत का बड़ा प्रचलन है।

कथा – सुकेतु नामक गृहस्थ की पत्नी का नाम शैव्या था । वह निःसंतान थी। दोनों पति-पत्नी सन्तान के लिए व्याकुल थे। एक बार दुखी होकर सुकेतु ने आत्महत्या करने की ठान ली। वह पत्नी को अकेला छोड़कर जंगलों में चला गया। वहाँ भूखा-प्यासा एक पेड़ के नीचे बैठकर भाग्य को कोसने लगा। वहां उसे ऋषि के कंठ से उच्चरित वेद मंत्र सुनाई दिये। वह उस ध्वनि की ओर चल दिया।

थोड़ी दूर चलने पर उसने देखा- ब्राह्मण लोग कमलों से भरे तालाब के तट पर वेदों का पाठ कर रहे हैं। सुकेतु भी श्रद्धापूर्वक प्रणाम करके वहाँ वेद-पाठ सुनने के लिए बैठ गया। वेद पाठ के उपरान्त सुकेतु ने वहाँ आने का कारण ब्राह्मणों को बताया। ब्राह्मणों ने उसे पुत्रदा एकादशी का व्रत करने की सलाह दी।

सुकेतु ने घर आकर कालांतर में पत्नी समेत विधिपूर्वक ‘पुत्रदा एकादशी का व्रत किया जिसके फलस्वरूप उसे पुत्र प्राप्ति हुई। तभी से इस व्रत का प्रचलन हुआ है।

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