इसे ‘बलि दुआदसी’ अथवा ‘वत्स द्वादशी’ भी कहते हैं। यह पर्व भी बहुरा चौथ तथा ‘हरछठ’ की भांति पुत्र की मंगल कामना के लिए किया जाता है। इसे पुत्रवती स्त्रियाँ करती हैं। इस पर्व पर गीली मिट्टी की गाय, बछड़ा, बाघ तथा बाघिन की मूर्तियाँ बनाकर पाट पर रखी जाती हैं। नैवेद्य में अंकुरित मोठ, मूँग तथा चने चढ़ाए जाते हैं। इस दिन द्विदलीय अन्नों का विशेष माहात्म्य है। इस दिन एक दलीय गेहूँ, जौ आदि अन्न तथा गो-दुग्ध आदि का प्रयोग नहीं किया जाता।

कथा – एक राजा रानी की बहुत ज्यादा सन्तान थी। उनके बच्चों के भी बच्चे थे। राजा ने संन्यास लेने का निर्णय किया। पंडितों को बुलाकर अपनी इच्छा व्यक्त की। पंडितों ने राजा को समझाया, “महाराज! आप घर में बैठे-बैठे पुण्य-कर्म कर सकते हैं- कुएं खुदवाओ, बगीचे लगवाओ, तालाब खुदवा दो। जंगल में जाकर संन्यास लेने में क्या रखा है?” राजा ने पूछा, “तो मैं इनमें से कौन सा काम करूँ जो सर्वश्रेष्ठ हो?” पंडितों ने तालाब बनवाने की सलाह दी। तालाब के जल से अनेक जीव लाभ उठा सकते हैं

राजा ने तालाब खुदवाया। चारों ओर से उसकी दीवार पक्की करवा दी। पर पानी न फूटा। राजा ने फिर पंडित बुलवाये। पंडितों ने कुबरा कुत्ता, भूरी बिल्ली, ज्येष्ठ पुत्र के लड़के तथा अगले हल की गोईं की बलि देने का आदेश दिया। राजा उलझन में पड़ गया। वह धर्म की रक्षा के लिए अधर्म करने के पक्ष में न था। उसके ज्येष्ठ पुत्र का तो एक ही लड़का था। उसकी बलि कैसे दी जा सकती थी। बलि के लिए ‘हरछठ’ का दिन नियत था। राजा ने बड़ी बहू की मां की बीमारी का बहाना करके उसे मायके भेज दिया। उस दिन हरछठ थी। बड़ी बहू ‘हरछठ’ का पूजन छोड़कर अपनी माँ के पास गई तो सही, पर बुरे मन से।

वहाँ जाते ही चंगी-भली माँ ने बेटी से ‘हरछठ’ के दिन आने का कारण पूछा तो उसने सारी बात कह दी। माँ ने कहा, “तुम्हारे साथ छल हुआ है। अच्छा चलो, भगवान सब भला करेंगे। चल हरछठ का पूजन कर “

इधर ज्यों ही राजा ने बलि की सारी सामग्री इकट्ठी करके जेठे लड़के को बलि की वेदी पर चढ़ाया तो तालाब पानी से लबालब भर गया। यह जानकर बहू भी बड़ी प्रसन्न हुई। माँ ने उसे आदेश दिया, “कल ओक दुआस है। चने भिगो दे। ” लड़की ने ‘ओक दुआस’ का पूजन अपने ससुराल में ही आकर करना चाहा। वह पुजापे की सारी सामग्री लेकर वहाँ पहुँच गई। उसने देखा कि तालाब पानी से भरा हुआ है। वह समीप के खेत में भरे पानी से नहाई। उसने वहीं बैठकर पूजा की। पाट पर गीली मिट्टी से बाघ-बाघिन की मूर्तियाँ बनाकर रखीं। हाथ में भीगे हुए चने लेकर अर्घ्य देती हुई बोली “ओख मोख नदी नारु कच्छ मच्छ के बीच होइकै मोर अगले के गोंईं उबर पार होय ” फिर चने डाल दिये। चनों के डालते ही अगले हल की गोईं बाहर निकल आई। उसने फिर हाथ में चने लेकर पहले वाला वाक्य दोहराया। तत्पश्चात् भूरी बिल्ली तथा कुबरा कुत्ता बाहर निकल आये। जब उसने वही वाक्य लड़के के लिए दोहराया तो लड़का भी निकल आया। लड़के को देखकर वह अपने सास-ससुर आदि पर बड़ी बड़बड़ाई तथा घर की ओर चल दी। राजा महल में द्वार बंद किए बैठा था। वह लज्जित होकर बाहर नहीं निकल रहा था। बहू ने किवाड़ खुलवाने के लिए ने खीझ कर कहा, “तुम सबने तो मेरा लड़का ही पानी में डुबो दिया था। उसकी ठीक से देखभाल भी न कर सके। मैं उसे निकाल कर लाई हूँ। न लाती तो वह मर ही गया होता। “

यह सुनकर राजा ने द्वार खोल दिये। राजा बोला, “बहू! मैंने तो सचमुच ही सब डुबो दिया था। तुम्हारा भाग्य प्रबल है जो तुम्हें तुम्हारा लड़का मिल गया।” इसके पश्चात् वे सब आनन्दपूर्वक रहने लगे।

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