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यह कुल देव-पूजन का दिन होता है। इस दिन कच्ची रसोई बनाने का विधान है। कुल देव को भोग लगाकर प्रसाद एक ही कुलगोत्र के लोगों में बाँट दिया जाता है। कुल देव का पूजन दोपहर के समय होता है। इस अवसर पर घर की सबसे बड़ी किन्तु पुत्रवती स्त्री दीवार पर गाजबीज का चित्र बनाती है। एक मढी बनाकर एक लड़के को उस पर बिठा दिया जाता । चित्र में एक लड़का किसी पेड़ के नीचे खड़ा चित्रित किया जाता है। इस मढ़ी पर गाज का गिर जाना तथा पेड़ की गाज से सुरक्षा दिखाना, इस चित्र की अपनी विशेषता होती है। यही गाज बीज का पूजन

कथा – बरसात का मौसम था। एक राजकुमार किसी जंगल में शिकार के लिए निकला। मूसलाधार वर्षा शुरू हो गई। राजकुमार हाथी पर से उतर कर जंगल में बनी पास वाली मढ़ी में चला गया। मढ़ी पर गाज गिरी और वह ढह गई। राजा का लड़का मृत्यु को प्राप्त हुआ। उस जंगल में एक ग्वालिन रहती थी। वह प्रतिदिन एक रोटी किसी गाय अथवा भूखी कन्या को श्रद्धापूर्वक दान दिया करती थी। जब राजकुमार पर गाज गिरी तब ग्वालिन का लड़का पास वाले वृक्ष के नीचे खड़ा था। गाज तो उस पर भी गिरा पर वह बच गया। कारण, कि उसके सिर पर उसकी मां द्वारा दी हुई रोटी छा गई थी।

राजकुमार के न लौटने पर खोज-बीन शुरू हुई। लोगों ने राजा को सारा दृश्य कह सुनाया जिससे वह बड़ा दुःखी हुआ। राजा सोचने लगा मैं इतना पुण्य-धर्म करता हूँ फिर भी मेरा बेटा मर गया, और यह ग्वालिन जो मात्र एक रोटी देती है, उसका पुत्र बच गया कितना अनर्थ है। तब राजा के गुरु ने बताया कि आपका पुण्य धर्म अभिमानपूर्वक होता है ग्वालिन का पुण्य कर्म श्रद्धा भावना से था। राजा इस अमूल्य शिक्षा को पाकर प्रसन्न हुआ। राजा रानी ने तब से विधिपूर्वक गाज-पूजन व्रत शुरू किया।


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