कार्तिक माह में भैयादूज के बाद जो तीज आती है, उस दिन यह व्रत किया जाता है। सन्तान, सौभाग्य व धन की इच्छा रखने वाली स्त्रियाँ इस व्रत को श्रद्धा से करती हैं। फिर कथा सुनी जाती है

कथा – एक नगरी में एक ब्राह्मण रहता था। वह दो जून रोटी भी अपने परिवार के लिए नहीं जुटा पाता था। उसने एक बकरी पाली। सोचा खर्च तो कुछ होगा नहीं। घास-पात खाकर दूध देती ही रहेगी। ब्राह्मण बकरी सदा अपने साथ ही रखता था। गंगा स्नान के लिए जाता समय बकरी को साथ ही ले जाता। एक बार बकरी नदी में डूब गई। ब्राह्मण रोने लगा। शंकर-पार्वती से उसका रुदन न देखा गया। उन्होंने ब्राह्मण की बकरी को नदी से निकाल कर एक सुन्दर कन्या बना दिया। एक दिन ब्राह्मण की अनुपस्थिति में ब्राह्मणी ने कन्या को एक भिखारी के हाथ दान दे दिया। शंकर के वरदान से बकरी कन्या बनी थी तथा हर रात को सवा-मन सोने का फूल उसके मुंह पर फूलता था। ब्राह्मणी की यह भेद पता न था। ब्राह्मण जब लौटकर आया तो कन्या दिखाई न दी। उसने ब्राह्मणी से कन्या के बारे में पूछा तो ब्राह्मणी ने सच-सच बता दिया। ब्राह्मण भिखारी की • खोज में चला। काफी कठिनाई से जब वह मिला तो भिखारी ने कन्या देने से इन्कार कर दिया तथा उससे विवाह भी कर लिया।

ब्राह्मण भी सोने का फूल छोड़ने वाला न था। अब वह रात्रि के समय अपनी पत्नी को कन्या के घर भेजता। ब्राह्मणी रोज सवा मन सोने के फूल ले आ जाती। भिखारी ने एक दिन कन्या से पूछा कि तुम्हारी माँ रोज आधी रात को ही क्यों आती है। तो कन्या ने सारा भेद उगल दिया। अगली बार आधी रात को भिखारी ने पहले ही फूल तोड़ लिया। अब ब्राह्मणी को खाली हाथ लौटना पड़ा। क्रोधित हो उसने कुछ आदमी भेजकर भिखारी को मरवा दिया। लाश के सामने बैठ कर कन्या विलाप करने लगी तो अचानक शंकर-गौरी उधर से निकले रोने का कारण पूछने पर कन्या ने सारी कथा कही। दया करके भगवान शंकर ने उसके पति को जीवित कर दिया। रात को फिर फूल खिला। इस बार भी ब्राह्मणी को निराश लौटना पड़ा। दूसरे दिन ब्राह्मणी ने भिखारी को मरवा कर सिर अपनी जांघ के नीचे रख लिया। कन्या फिर विलाप करने लगी। तो पुनः शंकर ने उसके विलाप का कारण पूछा तो उसने अपना दुःख भगवान से कहा। शव का सिर गायब देखकर सब समझ गए। शंकर ने भिखारी का रूप धारण किया तथा ब्राह्मणी के घर जा भिक्षा मांगने लगे। ब्राह्मणी ने कटे सिर को जांघ के नीचे दबा रखा था। अतः वे भिक्षा देने के लिए न उठी। शंकर भी याचक के रूप में शाम तक खड़े रहे। तंग आकर ब्राह्मणी ने कटे सिर को टोकरी के नीचे रखा और हाथ में डण्डा ले याचक को मारने के लिए दौड़ी। उधर पार्वती बिल्ली के रूप में आकर सिर ले भाग गई। बिल्ली के सिर ले जाने पर थोड़ी आहट सी हुई तो ह्मणी भीतर की तफर दौड़ी। शंकर यह कहते हुए भागे कि तुम्हारे यहाँ से कौन भीख लेगा। यहाँ से तो मुर्दा निकला है। सिर ले भगवान ने भिखारी को फिर जिन्दा कर दिया तथा कन्या से कहा – तुम दोनों यहाँ से कहीं चले जाओ। नहीं तो ब्राह्मणी फिर तुम्हें कोई न कोई कष्ट देती रहेगी।

दोनों पति-पत्नी नगर से दूर चले गए। यह ब्राह्मण कन्या मनचीता रानी थी। इसी का व्रत स्त्रियाँ करने लगी हैं।

यह व्रत अधिक प्रचलित नहीं है। फतेहपुर जिले में गंगा किनारे के कुछ ही गाँवों तक ही यह सीमित है।

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