एकादशी के सूर्योदय से द्वादशी के सूर्यास्त तक पानी न पीने का विधान होने के कारण इसे ‘निर्जला एकादशी’ कहते हैं। एक महीने में दो बार एकादशी पड़ती है। एकादशी का व्रत करना चाहिए। आहार-विहार विशेष क्रम बनाने से हमारे जीवन में सदाचार का प्रवेश होता है। स्वास्थ्य, दीर्घायु, सामाजिक सुख तथा मोक्ष फल की प्राप्ति में एकादशी के व्रत का विशेष महत्व बताया गया है।वर्ष भर की चौबीस एकादशियों में से ज्येष्ठ शुक्ला एकादशी सर्वोत्तम मानी गई है। इस एकादशी का व्रत रखने से समृची एकादशियों के व्रतों के फल की प्राप्ति सहज ही हो जाती है।

व्रत का विधान – ज्येष्ठ मास के एक तो दिन बड़े होते हैं दूसरे गर्मी की अधिकता के कारण प्यास कई बार लगती है। क्योंकि इस दिन पानी भी नहीं पीना चाहिए इसलिए यह व्रत अत्यधिक श्रमसाध्य होने के साथ-साथ कष्ट एवं संयम-साध्य भीहै। फिर भी यह व्रत हर किसी को करना चाहिए। जल पान के निषिद्ध होने पर भी फलाहार के पश्चात् दूध पीने का विधान इस व्रत में है। इस दिन व्रत करने वाले को चाहिए कि वह जल से कलश को भरे। सफेद वस्त्र का उस पर ढक्कन रखे। ढक्कन पर चीनी तथा दक्षिणा रख कर ब्राह्मणों को दान दें। औरतें नथ पहन कर, ओढ़नी ओढ़ कर, मेंहदी लगाकर पूर्वकथित विधिपूर्वक शीतल जल से भरा मिट्टी का घड़ा दान कर सास अथवा अपने से बड़ों का चरण स्पर्श करें। इस एकादशी का व्रत करके यथा सामर्थ्य अन्न, वस्त्र, छतरी, जूता, पंखी तथा फलादि का दान करना चाहिए। इस दिन निर्जल व्रत करते हुए शेषशायी रूप में भगवान विष्णु की आराधना का विशेष महत्व माना गया है।

इस दिन विधिपूर्वक जल कलश का दान करने वालों को वर्ष भर की एकादशियों का फल-लाभ प्राप्त हो जाता है। इस प्रकार के दान-भाव में ‘सर्व भूत हिते रताः’ की भावना चरितार्थ होती है।

कथा – एक दिन महर्षि व्यास ने पांडवों को एकादशी के व्रत का विधान तथा फल बताया। इस दिन भोजन करने के दोषों की जब वे चर्चा करने लगे तो भीमसेन ने अपनी आपत्ति प्रकट करते हुए कहा, “पितामह ! एकादशी का व्रत करते हुए समूचा पांडव परिवार इस दिन अन्न जल ग्रहण न करेगा। आपके इस आदेश का मुझसे पालन न हो पाएगा। मैं तो बिना खाए रह ही नहीं सकता। परिणामतः चौबीस एकादशियों पर निराहार रहने की कष्ट-साधना से बचा कर मुझे कोई एक ऐसा व्रत बताइए जिसे करने से मुझे विशेष असुविधा भी न हो और वह फल भी मिल जाए जो शेष लोगों को चौबीस एकादशी व्रत करने पर मिलेगा।महर्षि व्यास जानते थे कि भीमसेन के उदर में वृक नामक अग्नि है। इसीलिए अधिक मात्रा में भोजन करने पर भी उसकी भूख शांत नहीं होती। भीमसेन के इस प्रकार के भाव को समझ महर्षि व्यास ने आदेश दिया – “प्रिय भीम! तुम ज्येष्ठ शुक्ला एकादशी को ही मात्र एक व्रत किया करो । इस व्रत में स्नान आचमन में पानी पीने का दोष नहीं होता। इस दिन अन्न न खाकर, जितने पानी में एक माशा वजन की स्वर्ण मुद्रा डूब जाए, ग्रहण किया करो। ऐसा करते हुए इस एकादशी का व्रत करने से अन्य तेईस एकादशियों पर अन्न खाने का दोष छूट जाएगा तथा पूर्ण एकादशियों के पुण्य का लाभ भी मिलेगा। क्योंकि भीम मात्र एक एकादशी का व्रत करने के लिए महर्षि व्यास के सामने प्रतिज्ञा कर चुका था, इसीलिए इसी व्रत को करने लगा। इसी किंवदन्ती के आधार पर इसे ‘भीमर्सेनी एकादशी’ भी कहा जाता है।

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