यह पूजन भादों शुक्ला अष्टमी से आरम्भ होकर आश्विन की कृष्णाष्टमी तक चलता है। स्त्रियाँ कच्चे सूत के गंडे बनवाती हैं। इसमें सोलह धागे होते हैं। इसमें सोलह गांठें लगाई जाती हैं। भादों शुक्ला अष्टमी को जब इस अनुष्ठान का आरम्भ होता है तब स्त्रियाँ समीपस्थ नदी या तालाब में जाकर स्नान करती हैं। सधवा स्त्रियाँ अपने-अपने सिर पर चालीस-चालीस लोटे डालकर दूब सहित सोलह अंजलि से सूर्य को अर्घ्य देती हैं।

घर आकर शुद्ध स्थान पर चौकी रखकर, उस पर गंडा रख कर लक्ष्मी जी का आह्वान करती हैं। गण्डे का पूजन तथा हवन करती हैं। इस व्रत के सम्बन्ध में सोलह की संख्या का बड़ा महत्व है। इस व्रत को करने वाली स्त्रियाँ प्रतिवर्ष नियमपूर्वक १६ वर्षों तक इस व्रत को करती हैं। इस व्रत का उद्यापन १६वें वर्ष में होता है। अन्तिम दिन लक्ष्मी जी की मूर्ति अथवा अल्पना पर गंडे को दूब सहित रखकर पूजन किया जाता है। भोजन में पूरी-पुआ के साथ १६ पिड़ियां या ‘सोरहा’ जरूरी होना चाहिए। पाट या कदली के पत्र पर महाकाली तथा महालक्ष्मी की पुतलियाँ बनाई जाती हैं। आसपास आम तथा नौम के वन के सन्दर्भ में दो वृक्ष बनाये जाते हैं। यहाँ हाथी पर सवार राजा, हाथी के नीचे सूअर, हाथी आगे पंडित, छोटी रानी की बगल, कहारों के कंधे पर पालकी बनाई जाती है। इस व्रत पर सोलह बोल की कहानी सोलह बार कही व चावल छोड़े जाते हैं। आश्विन कृष्णाष्टमी को सोलह पकवान पकाए जाते हैं। ‘सोलह बोल’ की कथा है- “अमोती दमोती रानी, पोला परपाटन गाँव, मगरसेन राजा, बंभन बरुआ, कहे कहानी, सुना हो महालक्ष्मी देवी रानी, हमसे कहते तुमसे सुनते सोलह बोल की कहानी ।

हाथी की कहानी – एक राजा की दो रानियाँ थीं। एक रानी का केवल एक ही लड़का था। दूसरी के बहुत से लड़के थे। महालक्ष्मी पूजन के दिन छोटी रानी के बहुत से पुत्रों ने मिट्टी के लोंदे का हाथी बनाया जो बहुत बड़ा बन गया। रानी ने उसकी पूजा की। दूसरी रानी सिर नीचा किए खड़ी रही। लड़के के पूछने पर माँ ने थोड़ी-सी मिट्टी लाने को कहा। मैं भी उसका हाथी बनाकर पूजा कर लूँ। देखो तो, तुम्हारे भाइयों ने कितना बड़ा हाथी बनाया है। पर लड़के ने कहा, “माँ! तुम पूजा की तैयारी करो, मैं तुम्हारे लिए जीवित हाथी लाता हूँ। ” लड़का इन्द्र के यहाँ गया। अपनी माता के पूजन हेतु वह ऐरावत को ले आया। माता ने सप्रेम पूजन करके कहा

“क्या करें किसी के सौ साठ । मेरा एक पुत्र पुजावे आस ।।

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