हिंदू-स्त्री-समाज में यह दिन एक पर्व के रूप में मनाया जाता है। इस दिन भगवान शिव ने पार्वती जी को तथा पार्वती जी ने समस्त स्त्री समाज को सौभाग्य का वरदान दिया था। इस दिन सुहागिनें दोपहर तक व्रत रखती हैं। व्रत धारण से पूर्व रेणुका की गौरी की स्थापना करती हैं। गौरी की इस स्थापना पर सुहागी (सुहाग की सारी वस्तुएँ) – काँच की चूड़ियाँ, सिंदूर, महावर,

मेंहूदी, टीका, बिंदी, कंघी, शीशा, काजलादि चढ़ाई जाती हैं। सुहाग की इस सामग्री का अर्पण, चंदन, अक्षत, धूप-दीप दे विधिपूर्वक पूजन करके किया जाता है। फिर भोग लगाने के पश्चात गौरी की कथा कही जाती है। कथा के बाद गौरी पर चढ़ाए हुए सिंदूर से स्त्रियाँ अपनी मांग भरती हैं। इसके पश्चात् केवल एक बार भोजन करके व्रत का पारण किया जाता है। गनगौर का प्रसाद पुरुषों के लिए वर्जित है।

कथा- एक बार भगवान शंकर तथा पार्वती जी, नारद जी के साथ भ्रमण को निकले। वे चलते-चलते चैत्र शुक्ला तृतीया के दिन एक गाँव में पहुँच गए। उनका आना सुनकर गाँव की स्त्रियाँ उनके स्वागत के लिए स्वादिष्ट भोजन बनाने लगीं। भोजन बनाते-बनाते उन्हें काफी विलम्ब हो गया। श्रेष्ठ कुल की स्त्रियों से पहले ही नीच कुल की स्त्रियां भगवान के गाँव में प्रवेश करते ही थालियों में हल्दी तथा अक्षत लेकर पूजन हेतु पहुँच गईं।

पावती जी ने उनके पूजा भाव को स्वीकार करके सारा सुहाग रस उन पर छिड़क दिया। वे अटल सुहाग प्राप्ति का लाभ पाकर लौटीं। तत्पश्चात उच्च कुल की स्त्रियाँ अनेक प्रकार के पकवान लेकर वहाँ पहुँचीं। उनकी थालियाँ सोने-चाँदी से बनी थीं। उन स्त्रियों को आया देखकर भगवान शंकर ने पार्वती जी से कहा “तुमने सारा सुहाग रस तो नीच कुल की साधारण स्त्रियों को ही दे दिया है। अब इन्हें क्या दोगी?”

पार्वती जी ने उत्तर दिया, “प्राणनाथ! आप इसकी चिन्ता मत कीजिए। उन स्त्रियों को केवल ऊपरी पदार्थों से बना रस दिया गया है। इसलिए उनका रस धोती से रहेगा। परन्तु मैं इन उच्च कुल की स्त्रियों को अपनी अंगुली चीर कर आधे रक्त का सुहाग रस दूँगी। यह सुहागरस जिसके भाग्य में पड़ेगा वह तन-मन से मुझ जैसी सौभाग्यवती हो जाएगी। जब स्त्रियों ने पूजन समाप्त कर दिया तब पार्वती जी ने अपनी अंगुली चीर कर उन पर छिड़क दी। जिस पर जैसे छीटें पड़े, उसने वैसा ही सुहाग पा लिया ।

तत्पश्चात् भगवान शिव की आज्ञा से पार्वती जी ने नदी तट पर स्नान किया और बालू की शिव मूर्ति बनाकर पूजन करने लगीं। पूजन के बाद बालू के पकवान बनाकर शिवजी को भोग लगाया। प्रदक्षिणा करके नदी तट की मिट्टी से माथे तिलक लगा कर दो कण बालू का भोग लगाया। इतना सब करते-करते पार्वती जी को काफी समय लग गया। महादेव जी ने पार्वती से देर से आने का कारण पूछा। उत्तर में पार्वती जी ने कहा, “वहाँ मेरे भाई-भावज आदि मायके से आ गए थे। उन्हीं से बातें करने लग गई। ” फिर महादेव ने पूछा, “पार्वती! तुमने नदी के तट पर पूजन करके किस चीज का भोग लगाया था और स्वयं क्या प्रसाद खाया था?” पार्वती ने उत्तर दिया, “महाराज! मेरी भावजों ने मुझे दूध-भात खिलाया। उसे खाकर मैं सीधी यहाँ चली आ रही हूँ। ” ऐसा जानकर शिवजी भी दूध-भात खाने के लालच में नदी-तट की ओर चल दिए।

पार्वती दुविधा में पड़ गईं। तब उन्होंने मौन भाव से शिवजी का ही ध्यान करके प्रार्थना की – “भगवन्! यदि मैं आपकी अनन्य दासी हूँ तो आप इस समय मेरी लाज रखिए। ” ऐसी प्रार्थना करती हुई पार्वती जी भगवान शिव के पीछे-पीछे चलती रहीं। उन्हें दूर नदी के तट पर माया का महल दिखाई दिया। वहाँ महल के भीतर पहुँच कर वे क्या देखती हैं कि वहाँ शिवजी के साले तथा सलहज आदि सपरिवार विद्यमान हैं। उन्होंने गौरी तथा शंकर का भाव-भीना स्वागत किया। वे दो दिन वहाँ रहे।

तीसरे दिन पार्वती जी ने शिवजी से चलने के लिए कहा, पर शिवजी तैयार न हुए। तब पार्वती जी रूठ कर अकेली ही चल दीं। ऐसी हालत में भगवान शिव जी को पार्वती के साथ चलना पड़ा। नारद जी भी साथ-साथ चल दिए। वे चलते-चलते बहुत दूर निकल गए। सायंकाल हो गया। भगवान शंकर पार्वती से बोले, “मैं तुम्हारे मायके में अपनी माला भूल आया हूँ। माला लाने के लिए पार्वती तैयार हो गईं पर भगवान ने उन्हें न भेजा। नारद जी माला लेने चल दिए। पर वहाँ पहुँचने पर नारद जी को कोई महल नजर न आया। वहाँ तो दूर-दूर तक जंगल ही जंगल था जिसमें हिंसक पशु घूम रहे थे। नारद जी वहाँ भटकने लगे। सहसा बिजली चमकी। नारद जी को शिवजी की माला एक पेड़ पर टंगी हुई दिखाई दी। नारद जी ने माला ली और शिवजी के पास पहुँच कर वहाँ का हाल बताया। शिवजी ने हँसकर कहा, “यह सब पार्वती की ही लीला है। ” इस पर पार्वती बोली, “मैं किस योग्य हूँ । तब नारद जी ने सिर झुका कर कहा, “माता! आप पतिव्रताओं में सर्वश्रेष्ठ हैं। आप सौभाग्यवती समाज में आदि शक्ति हैं। यह सब आपके पतिव्रत का ही प्रभाव तो है। संसार की स्त्रियाँ आपके नाम-स्मरण करने मात्र से अटल सौभाग्य प्राप्त कर सकती हैं और समस्त सिद्धियों को बना तथा मिटा सकती हैं। तब आपके लिए यह कर्म कौन-सी बड़ी बात है? महामाये! गोपनीय पूजन अधिक शक्तिशाली तथा सार्थक होता है। आपकी भावना तथा चमत्कारपूर्ण शक्ति को देखकर मुझे बहुत प्रसन्नता हुई है। मैं आशीर्वाद रूप में कहता हूँ कि जो स्त्रियाँ इसी तरह गुप्त रूप से पति का पूजन करके मंगल कामना करेंगी उन्हें महादेव जी की कृपा से दीर्घायु वाले पति का संसर्ग मिलेगा। “

इसी कारण स्त्रियाँ इस व्रत को करती हैं।

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