इसे ‘भ्रातृ-द्वितीया’ भी कहते हैं। इस पर्व का प्रमुख लक्ष्य भाई तथा बहिन के पावन सम्बन्ध तथा प्रेम भाव की स्थापना करना है। इस दिन बहनें बेरी पूजन भी करती हैं। इस दिन बहनें भाइयों के स्वस्थ तथा दीर्घायु होने की मंगल कामना करके तिलक लगाती हैं। इस दिन बहन भाइयों को तेल मल कर गंगा-यमुना में स्नान करना चाहिए। यदि गंगा-यमुना में न नहाया जा सके तो भाई को बहिन के घर नहाना चाहिए। भाई को जीमा कर, तिलक लगा कर गोला देना चाहिए। यदि बहिन अपने हाथ से भाई को जीमाए तो भाई की उम्र बढ़ती है और जीवन के कष्ट दूर होते हैं। इस दिन चाहिए कि बहनें भाइयों को चावल खिलाएँ। इस दिन बहिन के घर भोजन करने का विशेष महत्व है। बहिन, चचेरी, ममेरी अथवा धर्म की कोई भी हो सकती है। यदि कोई भी बहिन न हो तो गाय, नदी आदि स्त्रीत्व पदार्थ का ध्यान करके अथवा उसके समीप बैठ कर भोजन कर लेना भी शुभ माना गया है।

इस दिन गोधन कूटने की प्रथा भी है। गोबर की मानव मूर्ति बना कर छाती पर ईंट रखकर स्त्रियाँ उसे मूसलों से तोड़ती हैं। स्त्रियाँ घर-घर जाकर चना, गूम तथा भटकैया चराव कर जिव्हा को भटकैया के कांटे से दागती भी हैं। दोपहर पर्यन्त यह सब करके बहिन-भाई पूजा विधान से इस पर्व को प्रसन्नता से मनाते हैं। इस दिन यमराज तथा यमुना जी के पूजन का विशेष विधान हैं।

भैयादूज कथा

भगवान सूर्य नारायण की पत्नी का नाम छाया था। उसी की कोख से यमराज तथा यमुना का जन्म हुआ था। यमुना यमराज से बड़ा स्नेह करती थी। वह उससे बराबर निवेदन करती कि इष्ट मित्रों सहित उसके घर आ कर भोजन करो। अपने कार्य में व्यस्त यमराज बात को टालता रहा। कार्तिक शुक्ला का दिन आया। यमुना ने उस दिन फिर यमराज को भोजन के लिए निमंत्रण देकर उसे अपने घर आने के लिए वचनबद्ध कर लिया।

यमराज ने सोचा, “मैं तो प्राणों को हरने वाला हूँ। मुझे कोई भी अपने घर नहीं बुलाना चाहता। बहिन जिस सद्भावना से मुझे बुला रही है उसका पालन करना मेरा भी धर्म है। बहिन के घर आते समय यमराज ने नरक में निवास करने वाले जीवों को मुक्त कर

यमराज को अपने घर आया देख कर यमुना की खुशी का ठिकाना न रहा। उसे स्नान कर पूजन करके अनेक व्यंजन परोस कर भोजन कराया। यमुना द्वारा किए गए आथितेय से यमराज ने प्रसन्न होकर बहिन को वर मांगने का आदेश दिया। यमुना ने कहा, “भद्र! आप प्रति वर्ष इसी दिन मेरे घर आकर भोजन करें। मेरी तरह जो बहिन इस दिन अपने भाई को आदर सत्कार करके टीका काढ़े उसे तुम्हारा भय न रहे।” यमराज ने ‘तथास्तु’ कह कर यमुना को अमूल्य वस्त्राभूषण देकर यमलोक की राह ली। इसी दिन से इस पर्व की परम्परा बनी। ऐसी मान्यता है कि जो भाई आज के दिन यमुना में स्नान करके पूरी श्रद्धा से बहनों के आथितेय को स्वीकार करते हैं उन्हें यम का भय नहीं रहता। इसीलिए भैयादूज को यमराज तथा यमुग का पूजन किया जाता है।

भैया दूज से सम्बन्धित कुछ कथाएँ और भी प्रचलित कथाओं का संक्षिप्त उल्लेख इस प्रकार है ।

(1) एक बहन के सात भाई थे। वह उन्हें बहुत प्यारी थी। उसका पति अपने माँ बाप का इकलौता बेटा था जिसके होने पर की गई मनौतियों को पूरा न करने से देवता अप्रसन्न थे। क्रुद्ध होकर देवताओं ने पुत्र तथा पुत्रवधू को मार डालने का निर्णय किया। उस बहन को किसी तरह इसका पता चल गया। उसने भावी जीवन में आने वाले दुःखों की कल्पना करके उपचार के तरीके सोचकर अपने भाइयों से ससुराल जाने की जिद की। यद्यपि वे बिना बुलाए नहीं भेजना चाहते थे पर बहिन के न मानने पर डोली सजा कर भेज दी। उसने अपने पास दूध, माँस तथा ओढ़नी रख ली। थोड़ी दूर जाने पर देवताओं के प्रकोप से टोली का रास्ता साँप ने रोक लिया। बहिन तुरंत दूध साँप के सामने रख कर आगे बढ़ गई। थोड़ी दूर और आगे जाने पर उस पर शेर झपटा तो उसने मांस फेंक दिया। शेर मांस में रुचि लेने लगा और कहार डोली लेकर आगे बढ़ गए। रास्ते में यमुना जी थीं। ज्योहि कहार डोली को यमुना से पार करने लगे, यमुना ऊँची लहरें उठाकर डोली को आत्मसात करने लगी। बहिन ने ओढ़नी समर्पित करके यमुना की लहरों को शांत किया।

नववधू को बिना बुलाए घर पधारी पाकर ससुराल वाले आश्चर्य में पड़ गए। बहिन ने आदेश दिया कि उसके गृह प्रवेश के लिए घर के पिछवाड़े फूलों का दरवाजा बनवाया जाए। दरवाजा बना। ज्यों ही वह पार करने लगी, द्वार उस पर गिर पड़ा। फूलों का दरवाजा होने कारण चोट न आ पाई। घर में प्रवेश करके उसने सबसे पहले स्वयं खाना खाने का हठ किया। खाना खाने लगी तो खाने में सुच्चा काँटा मिला जिसे उसने डिबिया में सहेज लिया। शाम को घूमने का समय आया तो सबसे पहले उसने ही जूता पहना। जूते में काला बिच्छू था। उसने वह भी

उसी डिबिया में सहेज कर रख लिया। रात हुई तो उसने फिर जिद्द की कि पहले शैय्या पर मैं ही सोऊंगी। बहू का हर काम के लिए पहल करना यद्यपि किसी को अच्छा नहीं लग रहा था. पर परिस्थिति वश सब हो रहा था। सोने के कमरे में उसे काला नाग मिला। उसने उसे भी मार कर सहेज लिया। फिर पति को शय्या पर सुलाया ।

इतना सब करने के पश्चात उसने अपनी सास को डिबिया खोल सुच्चा काँटा, बिच्छू तथा साँप दिखा कर कहा, “मैंने तुम्हें पुत्रवती किया है अर्थात स्वयं कष्ट सह कर तुम्हारे पुत्र के जीवन की रक्षा करके अपने सुहाग को नया जीवन दिया है। ये सब कष्ट देवताओं के रुष्ट को जाने के कारण उठाने पड़े हैं। भविष्य में कभी मनौती मान कर पूरा करना न भूलना। ” इतना कह कर सात भाइयों की परम प्यारी बहिन भाइयों के साथ पीहर लौट गई और सास ने देवी देवताओं का पूजन करके भाई-बहिनों के प्रेम की प्रशंसा तथा उनके सुखी होने की आशीष दी।

(2) एक ब्राह्मण के दो संताने थीं- एक लड़का और एक लड़की लड़की बड़ी सुशीला थी। वह भाई को कभी नाराज होकर बुरा भला न कहती थी। वह भाई अपनी बहिन से मिलने ससुराल गया। चर्खा कातती बहिन का सूत का तार टूट गया था। वह उसी को जोड़ने में लगी थी। इसलिए भाई का आना न जान सकी। तार जोड़ने के बाद वह भाई से गले मिली। प्यारे भाई के आदर सत्कार के लिए पड़ोसिनों की परामर्शानुसार उसने तेल का चौका लगा कर घी में चावल पकाए। पर चौका सूख न सका और चावल पक न सके। एक दूसरे सहेली के आदेश से उसने गोबर का चौका लगाकर दूध तथा पानी में चावल राँध कर भाई का सत्कार किया। दूसरे दिन भाई के चले जाने के लिए वह चक्की में आटा पीसने लगी। आटे के साथ ही चक्की में बैठा साँप भी पिस गया। उसे पता न चला। अतः अज्ञानवश उसने उस आटे के पकवान बना कर भी उसकी गाँठ में बाँध दिए। जब वह चला गया तो उसे साँप के पिस जाने का पता चला। भाई की प्यारी बहिन अपने बच्चे को पालने में ही सोता छोड़ भाई की राह पर चल दी। बहुत दूर जाने पर उसे उसका भाई एक पेड़ की छाया में सोया हुआ मिला। पास ही पकवानों की पोटली रखी थी भाई ने अब तक कुछ भी न खाया था। उसने सारे पकवान दूर फेंक दिए और भाई के साथ पीहर की ओर चल दी। रास्ते में उसने भारी-भारी शिलाएँ उड़ती देखीं। एक पथिक से जब उसने उन शिलाओं के बारे में पूछा तो उसने बताया कि जो बहिन अपने एक मात्र भाई से कभी नाराज न होती हो उसके भाई की शादी के समय ये उसकी छाती पर रखी जाएँगी। थोड़ी दूर जाने पर उसे नाग तथा नागिन मिले। नाग बोला जिसकी छाती पर ये शिलाएँ रखी जाएंगी, हम उसे खा लेंगे। उपाय पूछने पर नागिन ने बताया कि भाई के सब काम बहिन करे तथा भाई भावज को कोस कर गालियाँ दे तभी भाई बच सकेगा।

बस फिर क्या था। वहीं से वह भाई को कोसने लगी। गालियाँ देती देती वह पीहर पहुँच गई। माँ-बाप को पुत्री का यह व्यवहार बहुत बुरा लगा। विवाह की लगन आई तो वह भाई को गाली गलौच करती हुई स्वयं लगन चढ़वाने के लिए अड़ गई। इसी प्रकार घोड़ी पर बैठ गई। ज्यों ही वह घोड़ी पर बैठी त्यों ही शिलाएँ उड़ती हुई आई पर पुरुष के स्थान पर नारी को देखकर उलटे पांव मुड़ गई। ऐसा विचित्र देखकर बारात के लोग उसे अपने साथ ले गए। फेरों का समय आया तो उसने भाई को पीछे धकेल दिया और बुरी-बुरी गालियाँ देकर फेरे ले लिए। वह सब काम स्वयं करती गई। यहाँ तक कि सुहाग रात को भी भौजाई के साथ स्वयं सोने चल दी। नियत समय पर नाग नागिन उसके भाई को काटने आए। वह तो सारे रहस्य को जानती ही थी। नाग-नागिन को मारने की तैयारी उसने पहले ही कर रखी थी। आते ही दोनों को मार कर अपने जेब में रख कर तीन दिन तक सोई रही। सारे मेहमान विदा हो गए। तब उसकी माँ को उसकी भी सुधि आई थोड़ा बहुत बचा खुचा देकर इसे भी टाला जाए। विदाई के समय उसने माँ की उपेक्षा कर व्यंग्य करते हुए कहा, “मैं इतनी नाचीज नहीं हूँ। ” उसने मरे हुए साँप दिखा कर माँ को बताया कि ये भाई को काटने आए थे। मैंने अपनी जान पर खेल कर भाई के जीवन की रक्षा की है। इसी भाई की खातिर मैं अपने बच्चे तक को पालने में रोते चिल्लाते छोड़ आई हूँ। मेरी भाई-भावज को किसी प्रकार का कष्ट न होने पावे। यह कह जब वह खाली हाथ लौटने लगी तब माँ-पुत्र ने उसे रोका और पूरे सत्कार के साथ उसे विदा किया।

भैयादूज के दिन चित्रगुप्त की पूजा के साथ-साथ लेखनी, दवात तथा पुस्तकों की भी पूजा की जाती है। यमराज के आलेखक चित्रगुप्त की पूजा करते समय यह कहा जाता है — “लेखनी पट्टिकाहस्तं चित्रगुप्त नमाम्यहम्” ।

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