बसंत पंचमी

यह ऋतुराज वसन्त के आगमन का प्रथम दिन माना जाता है। भगवान श्रीकृष्ण इस उत्सव के अधिदेवता हैं। इसीलिए ब्रजप्रदेश में राधा तथा कृष्ण का आनन्द-विनोद बड़ी धूमधाम से मनाया जाता है। वसन्त ऋतु में प्रकृति का सौन्दर्य निखर उठता है। पक्षियों के कलरव, पुष्पों पर भौरों का गुंजार तथा मादकता से युक्त वातावरण वसन्त की अपनी विशेषता 1

इस दिन सामान्य पर्व-पद्धति के समान गृह का शोधन-लेपन करके पीताम्बर पहन कर, सामान्य हवन करके वसन्त ऋतु के वर्णनात्मक छन्दों का उच्चारण करके केशर या हल्दी मिश्रित हलवे के स्थाली पाक से आहुतियाँ देनी चाहियें। अपनी सुविधानुसार अपराह्न में सर्वजनों सहित पुष्पवाटिका में भ्रमण करना चाहिये।

इस दिन विष्णु-पूजन का महात्म्य है। इस दिन कामदेव के साथ रति तथा सरस्वती का पूजन भी होता है। सरस्वती पूजन से पूर्व विधि कलश की स्थापना करके गणेश, सूर्य, विष्णु तथा महादेव की पूजा करनी चाहिये। उत्तर प्रदेश में इसी दिन से फाग उड़ाना आरंभ करते हैं, जिसका क्रम फागुन की पूर्णिमा तक चलता है।

‘वसन्त-पंचमी’ के दिन किसान लोग नये अन्न में गुड़ तथा घृत मिश्रित करके अग्नि तथा पितृ-तर्पण करते हैं। वसन्त पंचमी हमारे आनन्द के अतिरेक का प्रतीक है।

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