हमारे देश में विवाह या किसी शुभ कार्य से सकुशल समाप्त होने पर पाँच या सात सौभाग्यवती स्त्रियों को निमंत्रण देकर उनके सौभाग्य की पूजा का प्रचलन है। महाराज दशरथ ने श्रीराम के विवाह से लौटकर सौभाग्यवती नारियों का सम्मान किया था। गोस्वामी तुलसीदास जी के शब्दों में

“विप्र बधू सब भूप बोलाई, चल चारु भूषन पहिराई। बहुरि बोलाइ सुआसिनी लीन्हीं, रुचि विचारि पहिरावनी दीन्हीं।’

पूर्वी प्रदेशों में इसे ‘अचानक देवी’ भी कहते हैं। पूजा के दिन प्रातः काल पाँच या सात सौभाग्यवती स्त्रियों को निमंत्रण देकर दोपहरी में बुलाया जाता है। किसी सुन्दर स्थान पर गोलाकार चौक पूर कर गेहूँ बिछाकर मिट्टी की सात टिल्लियाँ चक्राकार रखी जाती हैं। टिल्लियों पर सिंदूर लगाकर मिट्टी के कोरे घड़े में जल भरे कलश की स्थापना करके पूजन किया जाता है। पूजन से पूर्व आमंत्रित सुहागिनों को उबटन स्नान कराकर वस्त्राभूषणों से अलंकृत किया जाता है। वे पूजा के कलश को घेरकर बैठ जाती हैं। पंचांग पूजा के बाद अपने हाथों में अक्षत लेती हैं। पूजन करवाने वाली यदि सधवा हो तो वह भी पूजन में सम्मिलित होती है। इस समय कथा भी कही जाती है। कथा पूरी होते ही अक्षत कलश पर छोड़े जाते हैं। कलश के पास की मिट्टी की टिल्लियों का सिंदूर सुहागिनों के मस्तक पर लगाया जाता है। भुने हुए चने तथा गुड़ का प्रसाद बाँटा जाता है सुहागिनों को भोजन करवा कर ससम्मान विादा किया जाता है। रात को भजन-कीर्तन के साथ जागरण होता है।

कथा- –कोई भाई-बहन थे। भाई को चिड़िया पालन का शौक था। वह दिन रात उन्हीं की देखभाल में लगा रहता। उसकी सगाई हो गई तो वह दिन-प्रतिदिन दुबला होने लगा। एक दिन बहन ने उसके कमजोर होने का कारण पूछा तो उसने बताया उसे किसी बात का दुःख नहीं है। उसे यही चिन्ता लगी रहती है कि जब वह बारात सहित विवाह करने जाएगा तो पीछे से चिड़ियों को दाना पानी कौन देगा। यदि इनकी सार-संभाल में जरा-सी भी ढील हुई तो ये बेमौत मर जायेंगी। बहन ने भाई को धैर्य बंधवाकर कहा -“तुम जरा भी चिन्ता मत करो। यह काम मैं अपने जिम्मे लेती हूं। मैं उन्हें किसी प्रकार का कष्ट नहीं होने दूंगी।

कुछ दिनों में विवाह की तिथि निकट आ गयी। भाई दूल्हा बन कर बारात में चला गया। वह घर के कामों में इतनी व्यस्त रही कि चिड़ियों को समय पर दाना पानी न दे सकी। थोड़ा अवकाश पाकर जब वह चिड़ियों की ओर गई तो उसने कुछ चिड़ियों को मरा हुआ पाया उसे बड़ा दुःख हुआ। उसने मन ही मन ‘अवसान देवी’ का स्मरण करके प्रार्थना की – “देवी! आपकी कृपा से चिड़ियां जीवित हो उठें तो मैं दुरैया कराऊंगी। ” दैव-योग से से सारी चिड़ियां जीवित हो उठीं तब बहन ने उनको दाना पानी दिया। दाना-पानी देकर वह बाहर चली आई। द्वार पर खड़ी होकर सोचने लगी यदि कोई उधर से निकले तो उससे भुने हुए चने मंगवाऊं। सुहागिनों को न्यौता देकर बुलाऊं । तत्काल उधर से एक बारात आ निकली। लड़की ने बारातियों से निवेदन किया कि कोई उसे भुने हुए चने ला दे। बारातियों ने चने लाने से इंकार कर दिया।

बारात ने थोड़ी दूर आगे जाकर एक सुन्दर स्थान आराम किया। वहाँ दूल्हा मूर्छित हो गया। लड़की अपने घर के द्वार पर ही खड़ी थी कि उधर से एक अर्थी निकली। लड़की ने अर्थी के साथ जाने वालों से भुने हुए चने लाने को कहा। उनमें से एक ने कहा- “क्या हर्ज है। इसके चने भुनाने में देर ही कितनी लगेगी। शव दाह के लिए तो अभी बहुत समय है। कुछ लोग चने भुनाने के लिए चल दिए। तभी मुर्दा उठकर बैठ गया। लोगों ने श्रद्धापूर्वक लड़की को नमस्कार करके पूछा, “बहन! तुमने यह क्या जादू कर दिया है। जिससे मुर्दा जीवित हो उठा। ” उसने उत्तर दिया- “मुझे इसके बारे में क्या मालूम ? मेरी दुरैया जाने, अवसान देवी जाने। मैंने अवसान देवी से प्रार्थना की थी कि उसके भाई की मरी हुई चिड़ियाँ जीवित हो उठें। वे जीवित हो गईं। मैं देवी की पूजा के प्रसाद के लिए चने भुनाने चली थी। तुम लोगों ने दया करके मुझे चने भुनाकर दिये। तुम्हारा मुर्दा जीवित हो उठा। यह अवसान देवी की ही माया है। उन लोगों ने भी सुहागिनों को न्योता देकर बुलाया तथा ‘अवसान देवी’ की विधिपूर्वक पूजा की।

जिनका दूल्हा बेहोश हो गया था। वे भी लौटकर उसी जगह आये। उन्होंने लड़की से पूछा “तुमने हमारे दूल्हे को क्या कर दिया? वह तो मूर्छित पड़ा है। लड़की उत्तर दिया- “मैं क्या जानूं? मेरी अवसान देवी जाने देवी-पूजन के लिए चने भुना कर ला देने वालों का मुर्दा जीवित हो गया। तुमने इतना-सा काम करने से इंकार कर दिया तो तुम्हारा दूल्हा मूर्छित हो गया। इसमें मेरा क्या कसूर है?” तब उन लोगों ने लड़की से ‘अवसान देवी’ के पूजन की विधि पूछी। उन्होंने ज्योंही विधिपूर्वक पूजा करने का संकल्प किया – दूल्हा सचेत हो गया। सकुशल विवाह सम्पन्न हो गया। उन लोगों ने अपने घर पहुँचकर सात सुहागिनों को न्यौता दिया और आंचल भर श्रद्धापूर्वक ‘अवसान देवी’ का पूजन किया।

जब लड़की का भाई विवाह करके लौटा तब लड़की की माँ ने ‘अवसान देवी’ का विधिपूर्वक पूजन किया। तभी से विवाह के अन्त में ‘अवसान देवी’ के पूजन का प्रचलन हो गया।

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