इस व्रत के करने से व्रत, पूजा-तर्पण, आदि का फल अक्षय हो जाता है। इसलिए इसे ‘अक्षय नवमी’ भी कहते हैं। इस दिन गाय पृथ्वी, स्वर्ण तथा वस्त्राभूषणादि का देने से ब्रह्महत्या जैसे महापाप भी नष्ट हो जाते हैं। इस दिन स्नानादि करके आमले के वृक्ष के नीचे पूर्व की ओर मुख करके षोडशो या पंचोपचार से पूजन करके, जड़ में दूध की धारा गिराकर, पेड़ के चारों ओर सूत लपेटकर कर्पूर या घृत युक्त बत्ती से आरती करके १०८ परिक्रमाएँ करनी चाहिये। पूजा की सामग्री में जल, रोली, अक्षत, गुड़, बतासा, आँवला दीपक होने का विधान है। ब्राह्मण-ब्राह्मणी को भोजन कराकर धोती तथा दक्षिणा देकर स्वयं भोजन करना चाहिए। भोजन में आमले का होना अनिवार्य है। इस आमले का दान काले ब्राह्मण को करने का विशेष माहात्म्य है।

कथा- एक साहूकार था । वह आमला नौमी आने पर आमले के पेड़ के नीचे ब्राह्मणों को भोजन कराता था। सोने का दान करता था। उसके बेटों को उसका यह सब अच्छा न लगता। वे समझते यह घर लुटाने में लगा है। तंग आकर वह दूसरे गाँव चला गया। उसने वहाँ दुकान कर ली। दुकान के आगे आमले का पेड़ लगाया। उसे पानी से सींचने लगा । दुकान खूब चलने लगी। बेटों का सारा रोजगार ठप्प हो गया। तब बात उनको समझ में आई। वे सोचने लगे हम तो पिता के भाग्य से ही रोटी खाते थे। बेटे पिता के पास पहुँचकर अपनी करनी पर पश्चाताप करते हुए उसके पांव पड़ गये। बाप के आदेशानुसार बेटे भी आमल-पेड़ की पूजा करने लगे। उनके घर में पहले जैसी खुशहाली तथा धन-धान्य हो गया ।

हमारी प्रार्थना है कि हे आमल देव! जैसा चमत्कार तूने साहूकार के माध्यम से दिखाया है ऐसा सभी साधकों को दिखा। उनका भला कर ।

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