मघा एक नक्षत्र है। यह प्रायः भादों माह में पड़ता नक्षत्र होने पर किसी भी दिन यह व्रत किया जा सकता है। इस । मघा व्रत की कोई निश्चित तिथि नहीं है। अतिवृष्टि व अनावृष्टि से बचने के लिए ही यह व्रत किया जाता है। इस दिन स्त्रियाँ प्रातः ही स्नान करके रक्षा का धागा लेती हैं। कलश को स्थापना करके धागा पहले कलश में बांधा जाता है। उसी धागे को चौकी पर अंकित पुतलियों पर भी चढ़ाया जाता है। तत्पश्चात् उसी सूत्र को परिवार के सदस्यों के हाथों में बांधा जाता है। इस दिन माताएं बच्चों को कई तरह के भोजन, खीर पूरी आदि खिलाती हैं।

कथा – आकाश में घनघोर घटाएँ छाईं थीं। थोड़ी देर बाद रिमझिम-रिमझिम वर्षा होने लगी। पनारे बह निकले। पंडित जी ने पत्रा खोल कर देखा तो बोले-“मघा नक्षत्र लगा है। पंडिताइन कुछ दक्षिणा पाने के इरादे से रानी को मघा का सूत्र देने चली। ताकि राजा की विघ्नों से रक्षा हो। पर रानी इस पूजा-पाठ को, दान-पुण्य को व्यर्थ समझती थी। रानी ने उस ब्राह्मणी को भी दुत्कार दिया। पर दासी ने चुपचाप रानी की नजरें बचा कर मघा का डोरा ब्राह्मणी से ले लिया तथा उसे थोड़ी-बहुत दक्षिणा भी दे दी। वही दासी रानी की नजर बचा कर गाय के लिए थोड़ा-सा आटा जरूर निकाल लेती थी। एक दिन शिकार खेलते-खेलते राजा अपने साथियों से बिछुड़ कर जंगल में भटकने लगा। रानी के व्यवहार से राजा से “मघा” नाराज थी। मघा गरजने लगी। बिजली भी लपक लपक कर राजा को ग्रसने लगी, पर दासी के पुण्य कृत्यों ने राजा की रक्षा की।

घर आकर राजा बोले – “आज न जाने किसके दान-पुण्य के प्रभाव से मैं बच गया हूँ। ” रानी ने कहा- “मैं तो कभी दान ” नहीं करती । तब दासी ने भयभीत होकर ब्राह्मणी से मघा का डोरा लेने तथा रोज गाय को आटा देने की बात बता कर कहा कि इन्हीं के कारण राजा भी बच गए हैं।

अगले दिन जब ब्राह्मणी पुनः दासी के पास आई तो रानी ब्राह्मणी के पांव गिर कर क्षमा मांगने लगी। बहुत विनती करने पर ब्राह्मणी ने रानी को भी मघा का डोरा दिया। तब से रानी भो श्रद्धापूर्वक जप-तप व दान करने लगी।

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