इस दिन भगवान श्रीकृष्ण के अग्रज श्री बलराम जी का जन्म हुआ था। श्री बलराम जी का प्रधान शस्त्र हल तथा मूसल है। इसीलिए उन्हें हलधर कहते हैं। उन्हीं के नाम पर इस पर्व का नाम ‘हल षष्ठी’ पड़ा, क्योंकि इस दिन हल के पूजन का विशेष महत्व है। कृषि प्रधान हमारे देश का प्राणतत्व भी हल ही है। इस महान् उपयोगी हल तथा उसके धारक की समूचे देश में प्रतिष्ठा बढ़े इसलिए भी इस त्यौहार का विशेष महत्व है। हमारे देश के पूर्वी जिलों में इसे ‘ललई छठ’ भी कहते हैं। इस व्रतः को पुत्रवती स्त्रियाँ करती हैं। इस दिन हल द्वारा जुता हुआ फल तथा अन्न भी खाया जाता है। इस दिन गाय का दूध-दही भी वर्जित है। इस किन भैंस का दूध-दही ही खाया जाता है। इस दिन स्त्रियाँ महुवे की दातुन करती है। इस दिन प्रातःकाल स्नानादि के पश्चात् पृथ्वी को लीपकर एक छोटा-सा तालाव बनाया जाता है। इस तालाब में झरबेरी, ताश तथा पलाश की एक-एक शाखा बांधकर बनाई गई ‘हरछठ’ को गाड़ दिया जाता है। तब नारियां इसकी पूजा करती हैं। पूजा में सतनजा (चना, जौ, गेहूँ, धान, अरहर, मक्का तथा मूंग) चढ़ाने के बाद सूखी धूल, हरी कजरियाँ होली की राख, होली पर भुने हुए चने के होरही तथा जौ की बालें चढ़ाती हैं। हरछठ के समीप कोई आभूषण तथा हल्दी से रंगा हुआ कपड़ा भी रखा जाता है। इस प्रकार विधिपूर्वक पूजनोपरांत भैंस के मक्खन का हवन करके कथा कही जाती है।

कथा- (१) एक गर्भवती ग्वालिन के प्रसव का समय समीप आया। उसे प्रसव पीड़ा होने लगी। उसका दही भी बेचने के लिए रखा हुआ था। वह सोचने लगी बालक ने जन्म ले लिया तो दूध-दही न बिक पायेगा। अस्तु, वह दूध-दही की मटकियाँ सिर पर रख कर चली दी। चलते-चलते जब एक खेत के पास पहुंची तो उसकी प्रसव पीड़ा बढ़ गई। उसने वहाँ लड़के को जन्म दिया तथा लड़के को कपड़े में लपेटकर वहीं रख दिया और मटकियाँ उठा कर आगे बढ़ गई। उस दिन हरछठ थी। यद्यपि उसका दूध-दही गाय तथा भैंस का मिला जुला था पर उसने बेचते समय यही बताया कि केवल गाय का है तो दूध-दही बिक गया।

जहाँ ग्वालिन ने बच्चे को रखा था वहाँ एक किसान हल जोत रहा था। उसके बैल बिदक कर खेत की मेढ़ पर जा चढ़े। हल की नोक बच्चे के पेट में लगने से बच्चा मर गया। किसान को यह सब देखकर अपार दुःख हुआ। उसने तत्काल झरबेरी के कांटों से बच्चे के पेट में टांके लगाकर उसे वहीं पड़ा रहने दिया। ग्वालिन ने लौट कर बच्चे को मरा पाया तो विचार करने लगी कि यह मेरे ही पाप का फल है। मैंने आज ‘हरछठ’ के दिन व्रत करने वाली अनेक स्त्रियों को गाय का दूध-दही बेचकर उनका धर्म-भ्रष्ट किया है। उसी का दण्ड है यह। मुझे लौटकर अपना पाप प्रकट कर प्रायश्चित करना चाहिये। वह लौट कर वहाँ गई जहाँ उसने दूध-दही बेचा था। उसने गली-मुहल्ले में घूम-घूमकर अपने दूध-दही का सारा रहस्य जोर-जोर से आवाज लगाकर प्रकट कर दिया। यह सुनकर स्त्रियों ने अपनी धर्म-रक्षा के विचार से उसे आशीष दी। जब वह वापिस उसी खेत में पहुंची तो उसने देखा कि लड़का पलाश की छाया में पड़ा खेल रहा था। उसी दिन से ग्वालिन ने पाप छिपाने के लिए कभी झूठ न बोलने का प्रण किया

कथा- (२) एक नगर में दो स्त्रियाँ रहती थीं। जेठानी का नाम था तारा और देवरानी का नाम था सलोनी सलोनी सदाचारिणी सुशीला तथा दयालु थी। तारा दुष्टा थी। एक बार दोनों ने हरछठ का व्रत किया। सांयकाल के समय दोनों स्त्रियाँ थालियाँ परोसकर ठंडी होने के लिए रखकर बाहर बैठ गईं। उस दिन सलोनी ने खीर तथा तारा ने महेरी बनाई थी। अचानक घर में कुत्तों ने घुस कर थालियाँ चाट लीं। अन्दर से चप-चप की आवाज सुनकर दोनों अपने-अपने घर में भीतर गईं। सलोनी ने कुत्ते को खीर चाटते देखा तो कुछ न बोली। खीर के बर्तन में बची भी उसने कुत्ते को डाल दी। दूसरी ओर तारा ने कुत्ते को घर में बन्द करके मूसल से इतना मारा कि उसकी कमर तोड़ ही डाली। वह अधमरा हो गया। जैसे-तैसे बेचारा जान बचाकर भागा। दोनों कुत्ते जब बाहर इकट्ठे हुए तो एक दूसरे का हाल जानने लगे।

पहला कुत्ता बोला, ” वह स्त्री बहुत भली है। उसने मुझे खीर खाते देखकर भी कुछ नहीं कहा, उलटे मुझे भरपेट खीर खिलाई। मैं प्रसन्न होकर वहां से लौटा हूं। मेरी आत्मा तो उसे बार-बार आशीर्वाद देती है। मैं भगवान से यही कामना करता हूं कि मेरे मरने के बाद मैं उसी का पुत्र बनूँ ताकि जीवन भर उसकी सेवा करके इस ऋण को चुका पाऊँ। जिस प्रकार उसने मेरी आत्मा को तृप्त किया है उसी प्रकार मैं अगले जन्म में उसकी आत्मा को प्रसन्न करता रहूँ।

दूसरा कुत्ता बोला- “मेरी तो ऐसी दुर्गति कभी न हुई थी। पहले तो थाली में मुंह डालते ही दांत गोठले से हो गये फिर भी भूख से परेशान होकर मैंने दो चार कौर सटके ही थे कि वह आ गई। उसने तो मार-मार कर मेरी कमर तोड़ डाली। मैं तो ईश्वर से यही निवेदन करता हूं कि अगले जन्म में उसका पुत्र बनकर उससे पूरा-पूरा बदला चुकाऊँ। मैं भीतरी मार से उसका हृदय तथा कमर दोनों ही तोडना चाहता हूँ। “

दैवयोग से दूसरा कुत्ता मर गया और उसी स्त्री का पुत्र होकर जन्मा। दूसरे वर्ष जब घर-घर ‘हरछठ’ की पूजा हो रही थी तब वह लड़का मर गया। तारा को बहुत दुःख हुआ। पर क्या हो सकता था? भविष्य में प्रतिवर्ष उसके लड़का होता और ‘हरछठ’ के दिन मर जाता। तारा को संदेह हो गया। एक रात स्वप्न में उसी कुत्ते ने आकर कहा, “मैं ही बार-बार तेरा पुत्र होकर मृत्यु को प्राप्त होता हूँ। तूने मेरे साथ जो व्यवहार किया था, मैं उसी का बदला चुका रहा हूँ। ” तब तारा के पूछने पर उसने बताया कि अब से हरछठ के व्रत में हल से जुता हुआ फल तथा अन्न न खाना। गाय का दूध-दही होली को भुनी हुई बाल, होली की धूल आदि ‘हरछठ’ को पूजा में चढ़ाना। तब कहीं मैं तेरे घर जीवित रहूंगा। पूजा के समय यही तारकगण छिटकें तो तू समझना कि अब मैं यहाँ जीवित रहूंगा तारा ने वैसा ही किया। उसके बच्चे जीने लगे। तब से इस व्रत का प्रचलन और भी बढ़ गया है।

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