कार्तिक कृष्णा चतुर्थी को सौभाग्यवती स्त्रियाँ सुहाग, पति के स्वास्थ्य, आयु व मंगलकामना के लिए यह व्रत करती हैं। यह व्रत सौभाग्य और शुभ सन्तान देने वाला है।

कार्तिक मास के कृष्ण पक्ष में चन्द्रोदय व्यापिनी चतुर्थी को यह व्रत किया जाता है। इस व्रत को रखने वाली स्त्रियों को प्रातःकाल शौच आदि के बाद आचमन करके पति, पुत्र-पौत्र तथा सुख-सौभाग्य की इच्छा का संकल्प लेकर यह व्रत करना चाहिए। इस व्रत में शिव, पार्वती, स्वामी कार्तिकेय, गणेश तथा चन्द्रमा का पूजन करना चाहिए। चन्द्रोदय के बाद चन्द्रमा के दर्शन कर अर्घ्यदान देकर ही जल व भोजन ग्रहण करती हैं। पूजा के बाद तांबे या मिट्टी के करवे में चावल, उड़द की दाल, सुहाग की सामग्री यथा— कंघी, शीशा, सिंदूर, चूड़ियाँ, रिबन तथा रुपया रखकर दान करनी चाहिए तथा सासू जी के पांव छूकर फल, मेवा व सुहाग की सारी सामग्री उन्हें देनी चाहिए। इस व्रत के माहात्म्य पर महाभारत में एक कथा मिलती है कि

कथा- (1)

एक बार अर्जुन नीलगिरि पर तपस्या करने गये। द्रौपदी ने सोचा कि यहाँ हर समय अनेक प्रकार की विघ्न बाधाएँ आती रहती हैं। उनके शमन के लिए अर्जुन तो यहाँ हैं नहीं अतः कोई उपाय करना चाहिए। उन्होंने भगवान कृष्ण का ध्यान किया। भगवान वहाँ उपस्थित हुए तो द्रौपदी ने अपने कष्टों के निवारण हेतु कुछ उपाय बताने को कहा तो श्रीकृष्ण बोले- एक बार पार्वती जी ने भी शिवजी से यही प्रश्न किया था तो उन्होंने कहा था कि करवा चौथ का व्रत गृहस्थी में आने वाली छोटी-मोटी विघ्न-बाधाओं को दूर करने वाला है। पित्त-प्रकोप को भी समाप्त करता है

श्रीकृष्ण द्रौपदी से कहते हैं कि

प्राचीन काल में एक धर्मपरायण ब्राह्मण के सात पुत्र तथा एक पुत्री थी। बड़ी होने पर उसका विवाह किया गया। करक चतुर्थी को कन्या ने करवा चौथ का व्रत रखा। सात भाईयों की लाड़ली बहन को चन्द्रोदय से पहले भूख सताने लगी। उसका फूल-सा चेहरा मुरझा गया। भाइयों के लिए बहन की यह वेदना असह्य थी। वे कुछ उयाप सोचने लगे। पहले तो उन्होंने बहन से चन्द्रोदय से पहले ही भोजन करने को कहा पर बहन न मानी तो भाईयों ने स्नेहवश पीपल की आड़ में प्रकाश करके बहन से कहा, देखो चन्द्रोदय हो गया। उठो, अर्घ्य देकर भोजन करो। बहन उठी, चन्द्रमा को अर्घ्य देकर भोजन कर लिया। भोजन करते ही उसका पति मर गया। वह रोने-चिल्लाने लगी। दैवयोग से इन्द्राणी देवदासियों के साथ वहाँ से जा रही थीं। रोने की आवाज सुन वे वहाँ गईं और रोने का कारण पूछा। ब्राह्मण कन्या ने सब हाल कह सुनाया तो इन्द्राणी बोली कि तुमने करवा चौथ के व्रत में चन्द्रोदय से पूर्व ही अन्न-जल ग्रहण कर लिया है इसी से तुम्हारे पति की मृत्यु हुई है। अब यदि तुम मृत पति की सेवा करती हुई बारह महीनों तक प्रत्येक चौथ को यथाविधि व्रत करो फिर करवा चौथ को विधिवत् गौरी, शिव, गणेश, स्वामी कार्तिकेय सहित चन्द्रमा का पूजन करना चन्द्रोदय के बाद अर्घ्य देकर अन्न-जल ग्रहण करना तो तुम्हारे पति अवश्य जी उठेंगे। ब्राह्मण कन्या ने अगले वर्ष पुनः विधि से करवाचौथ का व्रत किया। व्रत के प्रभाव से उसका मृत पति जीवित हो गया।

इस प्रकार कथा कहकर श्रीकृष्ण द्रौपदी से बोले यदि तुम भी इसी प्रकार विधि से इस व्रत को करोगी तो तुम्हारे सब दुःख दूर हो जाएंगे। सुख-सौभाग्य, धन-धान्य में वृद्धि होगी।

द्रौपदी ने श्रीकृष्ण के कथानुसार करवा चौथ का व्रत रखा। उस व्रत के प्रभाव से महाभारत के युद्ध में कौरवों की हार तथा पांडवों की जीत हुई।

कथा – (२)

एक ब्राह्मण परिवार में सात बहुएँ थीं। छ. बहुओं के मायके वाले बहुत अमीर थे। इसी कारण ससुराल में उनका बड़ा मान था परन्तु छोटी के मायके में कोई न था। वह घर का सारा काम-काज करती सबकी सेवा करती पर कोई भी उससे प्यार नहीं करता, सभी दुतकारते रहते।

तीज-त्यौहारों पर भी जब उसके मायके से कोई न आता तो वह बहुत दुःखी होती। हर वर्ष की तरह इस वर्ष भी करवा चौथ का व्रत आया। अन्य बहुओं के मायकों से उनके भाई करवा लेकर आए। पर छोटी के मायके में यदि कोई होता तो करवा भी लाता। सास भी छोटी को ही खरी-खोटी सुना रही थी। वह दुःखी हो घर से निकल पड़ी और जंगल में जाकर रोने लगी। एक नाग बहुत देर तक उसका रोना सुनता रहा। अन्त में वह अपने बिल से निकल आया तथा छोटी से पूछने लगा-बेटी क्या बात है। तुम रो क्यों रही हो? छोटी बोली- आज करवा चौथ है मेरा कोई भाई नहीं है। यदि मेरा कोई भाई होता तो आज जरूर करवा लेकर आता। नाग को छोटी पर दया आई। नाग ने कहा- बेटी तुम घर चलो मैं अभी करवा लेकर आता हूँ। थोड़ी देर बाद नाग ससुराल पहुँचा। ससुराल वाले इतना सामान देखकर चकित हो गए। सास भी प्रसन्न हो गई। सास ने प्रसन्न मन से छोटी को नाग देवता के साथ भेज दिया।

नाग देवता ने छोटी को अपना सारा महल दिखाया और कहा – जितने दिन चाहो आराम से रहो। मन चाहा खाओ मन चाहा पहनो। पर एक बात याद रखना। सामने रखी नांद कभी मत खोलना। छोटी सारा समय महल में आराम से काटती पर नांद के बारे में उसकी उत्सुकता बढ़ती जाती। एक दिन जब घर में कोई न था उसने नांद को उठाकर देखा तो हजारों छोटे-छोटे सांप के बच्चे इधर-उधर रेंगने लगे। उसने जल्दी ही नांद ढक दी जल्दी में एक सांप की पूंछ नांद के नीचे आकर कट गई।

शाम को नाग के आने पर छोटी ने अपनी गलती स्वीकार कर ली। नाग ने भी उसे क्षमा कर दिया। जब छोटी ने ससुराल की इच्छा की तो उसे धन-रत्न आदि देकर विदा किया। छोटी के ससुराल में जब उसकी बड़ी इज्जत होने लगी।

जिस सांप की पूंछ कटी थी। उसे सभी बण्डा कहकर तंग करते। एक दिन उसने अपनी मां से पूछा कि मेरी पूंछ कैसे कटी है। मां ने कहा कि छोटी के नांद उठाने और जल्दी से रखने में ही तुम्हारी पूंछ कटी है तो वह बोला कि मैं छोटी से बदला लूंगा। मां के बहुत समझाने पर भी वह एक दिन चुपचाप छोटी के घर जा छुपा और मौका पाकर उसे काटने की सोचने लगा। वहाँ छोटी और उसकी सास में किसी बात पर बहस हो रही थी तो छोटी कसम खा-खाकर कह रही थी कि मैंने ऐसा नहीं किया। वह कह रही थी कि मुझे बण्डा भैया से प्यारा कोई नहीं है उन्हीं की कसम खाकर कहती हूँ कि मैंने ऐसा नहीं किया। बण्डा ने जब सुना तो सोचने लगा- -जो मुझसे इतना प्यार करती है। मैं उसे ही काटने आया हूं। वह चुपचाप घर चला गया। मां ने पूछा- ले आये बहन से बदला, वह कहने लगा मां बहन से कैसा बदला ?

तभी से बण्डा भाई व छोटी बहन हुए भाई प्रति वर्ष करवा चौथ के दिन करवा लेकर जाता व बहन बड़े प्यार ने करवा चौथ का व्रत करती ।

करवा चौथ आरती

ओम जय करवा मैया, माता जय करवा मैया

जो व्रत करे तुम्हारा, पार करो नइया.. ओम जय करवा मैया

सब जग की हो माता, तुम हो रुद्राणी।

यश तुम्हारा गावत, जग के सब प्राणी.. ओम जय करवा मैया

कार्तिक कृष्ण चतुर्थी, जो नारी व्रत करती। दीर्घायु पति होवे, दुख सारे हरती.. ओम जय करवा मैया

होए सुहागिन नारी, सुख संपत्ति पावे। गणपति जी बड़े दयालु, विघ्न सभी नाशे.. ओम जय करवा मैया

करवा मैया की आरती, व्रत कर जो गावे। व्रत हो जाता पूरन, सबं विधि सुख पावे.. ओम जय करवा भैया।

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